असम की 126 विधानसभा सीटों पर गुरुवार (9 अप्रैल) को मतदान संपन्न हो गया। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में 84.42% का ऐतिहासिक मतदान दर्ज किया गया है। भारी मतदान के इन आंकड़ों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा अपनी साख बचा पाएंगे, या कांग्रेस के युवा चेहरे गौरव गोगोई असम में सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखेंगे?
भारी मतदान, सत्ता के पक्ष में लहर या परिवर्तन की आहट?
असम में इस बार का मतदान पिछले चुनाव (2021) के 82.04% के रिकॉर्ड को भी पार कर गया है। राजनीति के जानकार मानते हैं कि जब भी मतदान का प्रतिशत इतना अधिक होता है, तो वह किसी गहरी लहर का संकेत होता है। NDA का दावा: सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने इसे 'ऐतिहासिक' बताते हुए दावा किया है कि जनता ने विकास और शांति के लिए वोट दिया है। कांग्रेस की उम्मीद: वहीं, गौरव गोगोई और कांग्रेस गठबंधन का मानना है कि यह भारी वोटिंग सरकार के खिलाफ गुस्से और 'बोर-असोम' (नए असम) की चाहत का परिणाम है।
हिमंता बनाम गौरव: प्रतिष्ठा की लड़ाई
यह चुनाव मुख्य रूप से दो चेहरों के इर्द-गिर्द सिमट गया है:
1. हिमंता बिस्वा सरमा (BJP - NDA)
हिमंता के लिए यह चुनाव उनकी प्रशासनिक क्षमता और 'हिंदुत्व प्लस विकास' के एजेंडे की परीक्षा है। घुसपैठ, परिसीमन (Delimitation) और नागरिकता जैसे मुद्दों पर उनके कड़े रुख ने जहाँ उनके आधार को मजबूत किया है, वहीं विपक्ष ने इसे ध्रुवीकरण का नाम दिया है।
2. गौरव गोगोई (Congress - INDI Alliance)
पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की विरासत को संभाल रहे गौरव गोगोई इस बार काफी आक्रामक दिखे। उन्होंने स्थानीय अस्मिता, बेरोजगारी और महंगाई को मुख्य मुद्दा बनाया। मुस्लिम वोटर्स और चाय बागान श्रमिकों के बीच कांग्रेस की पकड़ इस चुनाव के परिणाम तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगी।
मुस्लिम वोटर्स और 'किंगमेकर' की भूमिका
असम की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। धुबरी, बारपेटा और नगांव जैसे इलाकों में भारी मतदान ने रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है। क्या AIUDF का आधार खिसककर कांग्रेस की ओर गया है? या भाजपा ने लाभार्थी योजनाओं के जरिए इस वर्ग में भी सेंध लगाई है? इसका जवाब 4 मई को नतीजों के साथ ही मिलेगा।
