बिहार की सियासत में जाति का मुद्दा हमेशा से ही सबसे ऊपर रहा है। साल 2026 में एक बार फिर राज्य की राजनीति में जातिगत पहचान को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। इस बार बहस का केंद्र है—'भूमिहार बनाम भूमिहार ब्राह्मण' (Bhumihar vs Bhumihar Brahmin)। भूमिहार समाज की लंबे समय से मांग है कि सरकारी दस्तावेजों और उनके जाति प्रमाण पत्र (Caste Certificate) में उनकी जाति का नाम सिर्फ 'भूमिहार' न लिखकर 'भूमिहार ब्राह्मण' दर्ज किया जाए। हालांकि, बिहार सरकार ने इस मांग को साफ तौर पर खारिज कर दिया है, जिसके बाद सूबे की राजनीति गरमा गई है।
विधानसभा में क्यों हुआ हंगामा?
यह विवाद तब और तेज हो गया जब बिहार विधानसभा में बीजेपी (BJP) विधायक जिबेश कुमार मिश्रा ने इस मुद्दे पर एक प्रस्ताव पेश किया। इस पर जवाब देते हुए बिहार के उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने साफ कर दिया कि सरकार की ओर से भूमिहार जाति का नाम बदलकर 'भूमिहार ब्राह्मण' करने का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है और न ही सरकार का ऐसा कोई इरादा है। सरकार के इस सख्त रुख के बाद भूमिहार समुदाय के विधायकों में भारी नाराजगी देखी जा रही है। विवाद की जड़: 1931 का रिकॉर्ड बनाम 2015 की सिफारिश
इस पूरे विवाद की जड़ें इतिहास और सरकारी फैसलों से जुड़ी हैं:
1931 की जनगणना: भूमिहार संगठनों का तर्क है कि 1931 की ऐतिहासिक जाति जनगणना, पुराने राजस्व रिकॉर्ड और भूमि स्वामित्व के दस्तावेजों में इस समुदाय को स्पष्ट रूप से 'भूमिहार ब्राह्मण' लिखा गया था। सवर्ण आयोग की सिफारिश (2015): साल 2015 में बिहार राज्य सवर्ण आयोग ने सिफारिश की थी कि 'भूमिहार ब्राह्मण' की जगह केवल 'भूमिहार' शब्द का इस्तेमाल किया जाए। इसके बाद से ही सरकार ने जाति प्रमाण पत्रों में सिर्फ 'भूमिहार' लिखना शुरू कर दिया।
जाति आधारित गणना (2022-23):
हाल ही में बिहार सरकार द्वारा कराई गई जाति आधारित गणना की रिपोर्ट में जो 215 जातियों की सूची जारी की गई थी, उसमें भी इस बिरादरी का नाम केवल 'भूमिहार' ही दर्ज है। भगवान परशुराम परिषद के संस्थापक अवधेश मिश्रा और कैमूर के अंजनी कुमार बेनीपुरी जैसे प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब ऐतिहासिक तौर पर यह नाम दर्ज है, तो सवर्ण आयोग ने इसे क्यों बदला? इससे समाज में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। अब 'ST' (अनुसूचित जनजाति) दर्जे की भी उठी मांग इस विवाद में एक नया मोड़ तब आया जब बीजेपी के एक अन्य विधायक विशाल प्रशांत ने सरकार के रवैये पर नाराजगी जताते हुए एक बड़ी मांग कर दी। उन्होंने दावा किया कि भूमिहार ब्राह्मण समुदाय सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहद पिछड़ चुका है, इसलिए अब इस जाति को अनुसूचित जनजाति (ST - Scheduled Tribe) की श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए।
समीकरण
बिहार की कुल आबादी में भूमिहार ब्राह्मणों की हिस्सेदारी लगभग 2.86% है। भले ही यह आंकड़ा छोटा लगे, लेकिन बिहार की सवर्ण राजनीति और दर्जनों विधानसभा सीटों पर इस समाज का सीधा प्रभाव है। ब्राह्मण (3.65%) और राजपूत (3.45%) के साथ मिलकर यह समुदाय बिहार की राजनीति की दिशा तय करता रहा है। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले इस भावनात्मक और पहचान से जुड़े मुद्दे का दोबारा उठना नीतीश सरकार और विपक्ष दोनों के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
