अमेरिका में विदेशी कुशल कर्मचारियों के लिए रोजगार के रास्ते और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गए हैं। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने नए H-1B वर्क वीजा पर $100,000 से अधिक (लगभग $103,265) का शुल्क लगाने के लिए एक औपचारिक विनियमन प्रस्ताव पेश किया है। इस कदम से मुख्य रूप से टेक्नोलॉजी, रिसर्च, स्वास्थ्य और उच्च शिक्षा जैसे प्रमुख सेक्टरों पर गहरा असर पड़ने की संभावना है।
अस्थायी आदेश को स्थायी नियम में बदलने की तैयारी अमेरिकी प्रशासन ने पिछले वर्ष एक कार्यकारी आदेश के जरिए इस शुल्क को पहली बार अस्थायी रूप से लागू किया था, जिसकी समयसीमा सितंबर में समाप्त होने वाली है। अब डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने इसे फेडरल रजिस्टर में दर्ज कर एक स्थायी नियम का रूप देने की आधिकारिक प्रक्रिया शुरू कर दी है।
प्रस्ताव के तहत 30 दिनों का पब्लिक कमेंट पीरियड निर्धारित किया गया है, जिसके बाद जनता और उद्योग जगत की आपत्तियों व सुझावों की समीक्षा की जाएगी। उम्मीद जताई जा रही है कि साल के अंत तक इस नियम को अंतिम रूप देकर स्थायी कर दिया जाएगा। आम तौर पर H-1B वीजा आवेदन की सरकारी फीस $2,000 से $5,000 के बीच होती रही है, लेकिन इस नए प्रस्ताव के लागू होने के बाद यह बढ़कर सीधे $103,265 तक पहुंच जाएगी।
भारतीय प्रोफेशनल्स और वैश्विक टेक सेक्टर पर प्रभाव H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को आईटी, इंजीनियरिंग, विज्ञान और गणित (STEM) जैसे विशेष क्षेत्रों में विदेशी प्रतिभाओं को 3 से 6 साल के लिए नियुक्त करने की अनुमति देता है। अमेरिका द्वारा हर साल 65,000 सामान्य श्रेणी और 20,000 उच्च डिग्री धारकों के लिए यह वीजा जारी किया जाता है। कुल जारी किए जाने वाले वीजा में सबसे बड़ी हिस्सेदारी (70% से अधिक) भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और इंजीनियरों की होती है। इस भारी फीस वृद्धि के कारण कंपनियों, विशेषकर स्टार्टअप्स और मध्यम आकार की फर्मों के लिए विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करना आर्थिक रूप से बेहद महंगा हो जाएगा। इससे कंपनियों की परिचालन लागत बढ़ेगी और वे विदेशी प्रतिभाओं को नियुक्त करने से बच सकती हैं।
इस भारी-भरकम फीस को लेकर अमेरिका में कानूनी खींचतान भी चल रही है। इससे पहले एक फेडरल अदालत ने इस फीस को गैर-कानूनी बताते हुए इस पर रोक लगा दी थी। अदालत का मानना था कि संसद (कांग्रेस) की वैधानिक मंजूरी के बिना इतना भारी शुल्क तय करना प्रशासनिक अधिकारों के दायरे से बाहर है। वर्तमान में यह कानूनी मामला अपीलीय अदालत में विचाराधीन है। इसके बावजूद, प्रशासन इस प्रक्रिया को औपचारिक नियमों के तहत लाकर स्थायी बनाने के प्रयासों में जुटा हुआ है।
