इंटरनेशनल : इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भविष्य में अमेरिका की नीतियों में बदलाव की आशंका जताते हुए भारत समेत कई देशों के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत करने पर जोर दिया है। उनका कहना है कि आने वाले समय में अमेरिका में ऐसा राष्ट्रपति भी सत्ता में आ सकता है, जिसका रुख इजरायल के प्रति विरोधी हो। ऐसे में इजरायल को अपनी सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्थिति मजबूत करने के लिए दूसरे देशों के साथ भी गठबंधन बढ़ाने होंगे। <Cite refs={["turn694833search0","turn694833search2"]}/>
नेतन्याहू ने यह बात 18 अक्टूबर को अपनी सुरक्षा नीति पेश करते हुए कही। इजरायल में 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले उनका यह बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खास बात यह है कि उनके बयान के कुछ घंटे बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से नेतन्याहू के दोबारा प्रधानमंत्री बनने का समर्थन किया।
अमेरिका में बदल सकता है राजनीतिक माहौल
नेतन्याहू ने आशंका जताई कि करीब दो साल बाद अमेरिका में ऐसा राष्ट्रपति सत्ता में आ सकता है, जो इजरायल के प्रति बेहद विरोधी रुख अपनाए। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी परिस्थिति में इजरायल अमेरिका के साथ अपने संबंधों को कैसे संभालेगा और अपनी सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाएगा।
उन्होंने कहा कि अमेरिका के मौजूदा प्रशासन के कार्यकाल में इजरायल को अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। साथ ही, भविष्य में संबंध अच्छे रहें या उनमें तनाव आए, दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार रहना जरूरी है।
अमेरिका लंबे समय से इजरायल का प्रमुख सहयोगी रहा है। हालांकि, अमेरिकी राजनीति में इजरायल को लेकर अलग-अलग दलों और नेताओं के विचारों में अंतर देखने को मिला है। नेतन्याहू की पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और जो बाइडेन के साथ कई मुद्दों पर असहमति भी रही है।
भारत पर क्यों है नेतन्याहू की नजर?
नेतन्याहू ने भारत का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि इजरायल को दूसरे देशों के साथ भी अपने गठबंधन मजबूत करने चाहिए। उन्होंने भारत को एक बड़ा देश बताते हुए कहा कि इजरायल के पास अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोगियों का दायरा बढ़ाने के कई अवसर हैं।
भारत और इजरायल के बीच रक्षा, तकनीक, कृषि, व्यापार और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग है। दोनों देशों के संबंध पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण बने हैं। नेतन्याहू पहले भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने संबंधों और भारत के महत्व का जिक्र कर चुके हैं।
नेतन्याहू ने लैटिन अमेरिका का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, इस क्षेत्र में हो रहे राजनीतिक बदलाव इजरायल के लिए नए सहयोगियों के साथ संबंध विकसित करने का अवसर पैदा कर सकते हैं।
उनकी रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह है कि इजरायल केवल एक प्रमुख सहयोगी पर निर्भर न रहे, बल्कि दूसरे देशों के साथ भी ऐसे संबंध बनाए, जो मुश्किल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में उसके काम आ सकें।
विपक्ष ने सुरक्षा नीति पर उठाए सवाल
नेतन्याहू की इस रणनीति को लेकर इजरायल में राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट ने सुरक्षा नीति की आलोचना की है। उन्होंने इसे ठोस राष्ट्रीय सुरक्षा योजना के बजाय चुनाव से पहले की राजनीतिक कवायद बताया।
आइजेनकोट का आरोप है कि नेतन्याहू सुरक्षा से जुड़े वास्तविक सवालों का जवाब देने के बजाय जनता की चिंताओं और आशंकाओं को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इजरायल के सामने मौजूद सुरक्षा चुनौतियों के लिए स्पष्ट और प्रभावी रणनीति की जरूरत है।
दूसरी ओर, नेतन्याहू का जोर अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखने के साथ-साथ भारत और अन्य देशों के साथ गठबंधन बढ़ाने पर है।
भारत-इजरायल संबंधों पर क्या होगा असर?
नेतन्याहू के बयान से संकेत मिलता है कि इजरायल आने वाले समय में अपनी विदेश नीति में सहयोगियों का दायरा बढ़ाने पर अधिक ध्यान दे सकता है। भारत के साथ मजबूत संबंध इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं।
हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इजरायल की इस पहल के तहत भारत के साथ कौन से नए समझौते या सहयोग की योजनाएं सामने आएंगी। फिलहाल नेतन्याहू का बयान भविष्य की अमेरिकी राजनीति और इजरायल की सुरक्षा रणनीति को लेकर उनकी चिंताओं को उजागर करता है।
आने वाले दिनों में इजरायल के चुनाव और अमेरिका के साथ उसके संबंधों पर होने वाली राजनीतिक चर्चा यह तय करने में अहम होगी कि नेतन्याहू की गठबंधन बढ़ाने की रणनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।
