पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज एक नए युग की शुरुआत हो गई है। 15 साल तक राज्य की सत्ता पर एकछत्र राज करने वाली ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) को 2026 के विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। चुनाव आयोग के रुझानों और नतीजों ने साफ कर दिया है कि बंगाल की जनता ने इस बार 'बदलाव' के पक्ष में मतदान किया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर वह 'अजेय' मानी जाने वाली ममता बनर्जी कहाँ चूक गईं? राजनीति के जानकारों और जमीनी हकीकत का विश्लेषण करें तो ये 5 बड़े फैक्टर्स दीदी की हार की मुख्य वजह बने:
1. आरजी कर मेडिकल कॉलेज कांड और महिला सुरक्षा अगस्त 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक महिला डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया था। इस घटना के बाद ममता सरकार के खिलाफ जो जन-आक्रोश फूटा, वह चुनाव तक कम नहीं हुआ। 'महिला सुरक्षा' जो कभी ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी, वही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। संदेशखाली और आरजी कर जैसी घटनाओं ने महिला मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को टीएमसी से दूर कर दिया।
2. भ्रष्टाचार और 'सिंडिकेट' राज का साया
शिक्षक भर्ती घोटाला हो या राशन घोटाला, टीएमसी के कई बड़े नेताओं का जेल जाना पार्टी की छवि पर भारी पड़ा। ग्रामीण इलाकों में 'सिंडिकेट' और जबरन वसूली की शिकायतों ने आम जनता के बीच सरकार के खिलाफ माहौल तैयार किया। भ्रष्टाचार के इन आरोपों को विपक्षी दल बीजेपी ने प्रमुखता से भुनाया, जिससे "स्वच्छ शासन" की चाहत रखने वाले युवाओं और मध्यम वर्ग ने टीएमसी का साथ छोड़ दिया।
3. चुनावी नैरेटिव में स्पष्टता की कमी
इस बार के चुनाव में ममता बनर्जी के पास कोई ठोस 'नैरेटिव' नहीं दिखा। जहाँ 2021 में उन्होंने 'बाहरी बनाम बंगाली' कार्ड खेलकर जीत हासिल की थी, वहीं इस बार उनका जोर केवल 'मंदिर' और धार्मिक तुष्टीकरण पर दिखा। दूसरी ओर, विपक्ष ने 'रोजगार' और 'औद्योगिक विकास' का एक स्पष्ट रोडमैप जनता के सामने रखा, जो मतदाताओं को अधिक प्रभावी लगा।
4. स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और वोटिंग पैटर्न
चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान बड़ी संख्या में नाम काटे गए। टीएमसी ने इसे राजनीतिक साजिश बताया, लेकिन चुनाव आयोग के कड़े रुख और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के कारण इस बार चुनावी हिंसा और फर्जी वोटिंग पर लगाम लगी। 90% से अधिक के रिकॉर्ड मतदान ने यह साबित कर दिया कि जब जनता बिना डरे बाहर निकलती है, तो परिणाम सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) के पक्ष में जाते हैं।
5. कल्याणकारी योजनाओं की चमक पड़ी फीकी
ममता सरकार की 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं को टक्कर देने के लिए विपक्षी दलों ने और भी बड़े वादे किए। जब मतदाताओं को यह लगा कि उन्हें वर्तमान लाभ से अधिक मिल सकता है, तो कल्याणकारी योजनाओं का जादू कम होने लगा। इसके अलावा, सरकारी कर्मचारियों के डीए (DA) का मुद्दा और बेरोजगारी ने शहरी इलाकों में टीएमसी की पकड़ ढीली कर दी।
